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Saturday, 12 October 2013

सुनहरा हंस


रामलाल एक धनी व्यापारी था। उसमें बस एक कमी थी—वह बहुत कामचोर और आलसी था सुबह देर तक सोना उसे बहुत पसंद था।
अपने आलसी स्वभाव के कारण धीरे-धीरे सुन्दर लाल की सेहत बिगड़ने लगी। वह पलंग पर पड़ा-पड़ा मोटा हो गया। उससे अब ज्यादा चला-फिरा नहीं जाता था। उसने अब अपने सारे काम नौकरों पर छोड़ रखे थे।

नौकर अपने मालिक के आलसी स्वभाव से परिचित थे। उन्होंने भी धीरे-धीरे बेईमानी करना शुरू कर दी और उससे रामलाल को व्यापार में नुकसान होने लगा।
एक दिन रामलाल का मित्र उससे मिलने आया। रामलाल ने अपने मित्र से अपनी बीमारी के बारे में बताया। मित्र होशियार था, वह तुरन्त समझ गया कि रामलाल का आलसीपन ही सारी बीमारी की जड़ है। उसने रामलाल से कहा—‘‘तुम्हारी बीमारी को दूर करने का उपाय में जानता हूँ, पर तुम वह कर नहीं सकते, क्योंकि इसके लिए तुम्हें जल्दी उठना पड़ेगा।’’

रामलाल ने कहा कि बीमारी ठीक होने के लिए सब कुछ करने को तैयार है।
मित्र ने कहा, ‘‘सुबह-सुबह अक्सर एक सुनहरा हंस आता है। तुम अगर उसे देख लो तो तुम्हारे सारे कष्ट दूर हो जायेंगे।’’
रामलाल अगले दिन सुबह-सुबह उठकर सुनहरे हंस को खोजने चल पड़ा।
रास्ते में उसने देखा कि नौकर उसी के भण्डार से अनाज चोरी कर रहे हैं। ग्वाला दूध में पानी मिला रहा है। रामलाल ने अपनी सभी नौकरों को डांटा।

अगले दिन फिर रामलाल सुनहरे हंस की खोज में निकला। सुनहरे पक्षी तो मिलना नहीं था, पर अपने मालिक को रोज आते देख भण्डार से चोरी होनी बन्द हो गयी। सभी नौकर अपना काम ठीक से करने लगे। चलने-फिरने से रामलाल का स्वास्थ्य भी ठीक रहने लगा।
कुछ समय बाद रामलाल का मित्र वापस रामलाल के पास आया।
रामलाल ने मित्र से कहा—‘‘मैं इतने दिनों से सुनहरे हंस को खोज रहा हूँ, पर वह मुझे दिखाई नहीं दिया।’’
मित्र ने कहा—‘‘तुम्हारा परिश्रम ही वह सुनहरा हंस है। तुमने जब से खेतों में जाना शुरू किया है, तुम्हारे यहाँ चोरी बन्द हो गयी और तुम्हारा स्वास्थ्य भी ठीक हो गया।
मित्र की बात अब रामलाल की समझ में आ गयी। उसने उसी दिन के बाद से आलस करना छोड़ दिया।

 दोस्तों ये कहानी हमें बताती है कि सबको अपने काम स्वयं करने चाहिए। परिश्रम और मेहनत से ही काम सफल होते हैं।