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Wednesday, 9 October 2013

माँ के हाथ



आज सुबह अचानक माँ के हाथों की याद आई,
कितने कठोर-कड़े और बेरौनक हैं उनके हाथ,
हरदम काम करती,
पल भर भी न आराम करती,
गोबर हटाती, उपले पाथती, रोटियाँ सेंकती,
चापाकल चलाती, बरतन मलती, ठहर लगाती,
ऐसा लगता है हाथों के बल धरती पर चलती है
नहीं तो इतने कठोर और कड़े कैसे हो गए उसके हाथ
उसके हाथ सदा से तो ऐसे न रहे होंगे
कभी तो कोमल रहे होंगे उसके
कभी तो उनमें भी रचती रही होगी मेहँदी
लेकिन जब से जानता हूँ माँ को
देख रहा हूँ
उसके हाथों के कठोरपन को
रात में हमें जब भी आ रही होती थी नींद
आती थी वह हमारे पास
तेल की कटोरी लिए अपने हाथों से
लगाती हमारे सिर पर तेल
सँवारती हमें जब नींद में जा पहुँचते
तब तक वह जागती हमारे सिरहाने बैठकर
हमारा मुँह निहारती

अभी वह दूर है
मैं सचमुच का परदेसी हो गया हूँ
लग रहा है जैसे वह दूसरे लोक चली गई हो
बस उसके हाथ दूर से दिख रहे हैं
खटते हुए, हमें सँवारते हुए बनाते हुए
हर फटे-पुराने को जोड़ते चमकाते हुए।