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Tuesday, 15 October 2013

सुन न माँ , सुन रही है न माँ

तुम कहती हो मैं निर्मोही हूँ
अपनों की परवाह नहीं
अपनी धुन का राही हूँ |
कहनी है इक बात पर कह नहीं पाता
मन भावुक है, बहने वाली ज़ुबान नहीं
न जानू , क्या ! समझा पाऊं ?
बिल्व फल का हूँ जैसे बाहरी छाल |
बचपन में जैसा था अब भी वैसा हूँ
कुछ बदला तो काया
समझ सकूँ अनजानी राहें
वो सोच है बदली
मन से अब भी वही बाला हूँ |
मीलों दूर हूँ तुझसे
कहने को हैं इंसान बहुत
दिखते घर हज़ार
अकेला हर पल खुद को पाता हूँ |
मैं अपराधी हूँ
जो निर्मोही हूँ तेरा
बड़ा हो गया , लिहाज़ ना करना
न करना इंतज़ार
पड़ती थी जो झाड़ू की मार |
बहुत याद आती है तेरी,
अक्सर ख्यालों में खो जाता हूँ
खुद को तेरी छाया में पाता हूँ |
सुन न माँ , सुन रही है न माँ ………………………….