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Friday, 20 September 2013

पति पत्नी का झगड़ा कविता अंदाज़ में


पति लगता है आज बाग़ में फूल नहीं खिला
         इतनी देर हो गयी काम से आये हुए अभी तक खाना नहीं मिला
पत्नी ने जवाब देते हुए कहाँ
आज मैंने सारे कपड़े धोये थे
जो तुमने कल पानी में भिजोये थे
पति कहता है
अच्छा अब ताना मत दे कपड़े भिजोने का
उठा के मुँह पर तेरे डाल दूंगा पानी भिगोने का
पत्नी घुस्से में
अजी हाथ तुम लगा के दिखाओ बोल दूंगी अपने भाई से
ले आयेगा चाकू-छुरी हाथ कटवा देगा किसी कसाई से
पति को और घुस्सा आया बेचारा भूक से तड़पते हुए कहता है
तेरी यही बचकानी हरक़त से मै बहुत डरता हूँ
नींद नहीं आती रातो को इसलिए रात भर जगता हूँ
पत्नी भावुक होकर
अच्छा जी अब चुप भी करो
रोटी कैसे बनती घर में राशन तो भरो
पति माथा पकड़ बेठ जाता है और कहता है
आरी ओ अक्ल की दुश्मन जब नहीं था कुछ पकाने को
सुबह ही बता देती ले आता कुछ बहार से खाने को
पत्नी हँसते हुए
अजी कैसे बताती आपको आप निकल गए थे जल्दी
सुबह से कुछ नहीं खाया मैंने भी पेट अपना भर रही थी खा खाकर शकरकंदी
पति हार मानकर
चलो मै जा रहा हूँ सोने सुबह खा लूँगा बहार जाकर
कुछ नहीं मिलना अब और तुमसे दिमाग लड़ाकर
पत्नी घुस्से में फिर से
क्या करूँ अब तेरा समझ में नहीं आता जान
तुम्हारा भी दिमाग खा
खाकर नहीं होना कल्याण