A

Sunday, 16 November 2014

'A' फॉर Apple


एक लगन थी सुखिया के मन में,
दिन भर चाय की दुकान पर काम करके जो पैसे कमाए थे,
बर्बाद किये कॉपी किताब और पेन खरीदने में
तो घर पर खूब पिटाई हुई,..


'हार कर भी जो हार न माने, उस पागल को 'मन' कहें',..
सुखिया ने बड़ी कहानियां सुन रखी थी,..
'मन में चाह होना चाहिए बस,
लोग तो स्ट्रीट लाइट के नीचे
पढ़कर भी बड़े आदमी बने है',..
पहुँच गया वो भी स्ट्रीट लाइट के नीचे पढ़ने,.
बैठा ही था अभी, की तेज बारिश हो गई, जैसे तैसे
कॉपी किताब संभाली लेकिन पेन,.. पेन बारिश में
कही खो गया, वो बेतहाशा उसे ढूंढने लगा, दिन भर
की थकान पसीना सब बारिश में घुलने लगे, उसे एक
अजीब सा मजा आने लगा,
ठंडी हवा, दिन भर की थकान, बारिश, पसीना, कॉपी किताबें, बापू
की मार, सुखिया और 'सुख' सब एक हो गए,
बारिश के पानी पर ही उसने ऊँगली से 'A' फॉर एप्पल
बनाया,..
यह देखकर पास बेवजह उग आई खरपतवार के कुछ फूल
मुस्कुराकर झड़ गए।